धरती कहे पुकार के
- Sep 13, 2023
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Updated: Sep 14, 2023
श्री भगवद्गीता में कहा गया है कि “जातस्य हि ध्रुवो मृत्युध्रुवं जन्म मृतस्य च” अर्थात् “पैदा हुए की मृत्यु और मरे हुए का जन्म जरूर होगा।”.
जीवन की इस अनंत यात्रा में जितनी भी सुख सुविधाएँ, प्रसिद्धि आदि प्राप्त होती हैं वो सब हमारे भौतिक शरीर के लिए ही होती हैं, लेकिन आत्मा के लिए कुछ भी नहीं होता। आत्मा तो अपरिचित ही रह जाती है।
यहाँ तक कि अधिकांश गाने जो हमने सुने हैं उनमें भी आत्मा की बजाय शारीरिक लालसाओं और भावनाओं पर ही ज़ोर दिया गया है।
जहां शरीर और उसकी ख़ूबसूरती के लिए असंख्य गीत हैं, वहीं आत्मा के लिए तो ज़्यादा गाने ही नहीं बने हैं।
बहुत कम ही गीत ऐसे हैं जिन्हें आत्मा की आवाज़ कहा जा सकता है।
ऐसा ही एक गीत है, शैलेंद्र का लिखा हुआ धरती कहे पुकार के।

शैलेंद्र की लिखाई में एक वैसी ही सरलता मिलती है जैसी कि कबीर के दोहों में होती थी और उसी सरलता से उन्होंने ये गीत लिखा है जिसे आसानी से 'आत्मा का गीत' कहा जा सकता है।
आत्मा अनंत काल में घूमती रहती है और शरीर बदल कर समय की इस नदी में बहती रहती है। इस नदी में हमारे अपने अनुभव या भावनाओं का उतार चढ़ाव चाहे जैसे भी हो, इसके बहाव से बचने का कोई तरीक़ा ही नहीं है। जीवन नाम की इस नदी को देर-सबेर हमें पार करना ही होगा। जीवन की इस यात्रा में कोई पीछे नहीं रहता।
गंगा और जमुना की गहरी है धार,
आगे या पीछे सबको जाना है पार।
चुनौतियों और मुश्किलों से भरी इस जीवन यात्रा में प्रत्येक व्यक्ति के जीवन जीने का अपना अलग तरीक़ा होता है। और चूँकि ये एक व्यक्तिगत यात्रा होती है तो हर तरीक़ा सही भी लगता है।
तो जीवन जीने का सबसे अच्छा तरीक़ा क्या है, इसका कोई आदर्श तरीक़ा हो सकता है क्या?
शैलेंद्र इस सवाल का जवाब भी अपने अनूठे अन्दाज़ में ही दे देते हैं।
एक ऐसी दुनिया जो हर प्रकार के कारणों से बँटी हुयी है, ऐसी दुनिया में जीने का सिर्फ़ एक ही तरीक़ा है, मानवता का तरीक़ा। आदर्श तरीक़ा एक ही है, प्यार फैलाना और एक खूबसूरत दुनिया बनाना जहां सिर्फ़ शांति और ख़ुशी हो। और ऐसी दुनिया बनाने के लिए ही शैलेंद्र प्यार के बीज बोने और प्यार ही उगाने की कामना करते हैं। 'धरती कहे पुकार के, बीज बिछा ले प्यार के' एक रूपक है जो लोगों को एक-दूसरे के साथ मजबूत संबंध बनाने में समय और प्रयास लगाने के लिए प्रोत्साहित करता है। रिश्ते बनाने के लिए उतनी ही मेहनत और समर्पण की आवश्यकता होती है जितनी किसी बगीचे में बीज फैलाने के लिए लगती है।
"जीवन का एकमात्र उदेश्य मानवता की सेवा करना है।" - लियो टॉल्स्टॉय
धरती कहे पुकार के,
बीज बिछा ले प्यार के,
मौसम बीता जाए , मौसम बीता जाए
कभी सोचा है अगर आत्मा बोल सकती तो उस शरीर को क्या कहेगी जिसमें वह रहती है?
केवल एक ही बात, 'अपने पीछे एक विरासत छोड़ जाओ, कुछ ऐसा जिससे लोग आपको याद रखें’।
"जिंदगी एक कोरी किताब की तरह है, आप अपनी कहानी खुद लिखते हैं, दूसरों की नहीं।" - जिहान झेंग
हमारी ज़िंदगी में समय सीमित है पर इच्छाएँ असीमित। अपनी इच्छाओं को पूरा करते समय हमारी पहली प्राथमिकता अपने जीवन को सार्थक बनाने की होनी चाहिए।हमारा विवेक हमें सब प्राणियों से अलग करता है इसलिए ये ज़रूरी है की इस विवेक का इस्तेमाल करते हुए हम ऐसा कुछ करें जिससे हमारी अपनी कहानी भी कुछ सार्थक बन सके।
हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, मानव शरीर प्राप्त करने से पहले आत्मा कई जन्मों से गुजरती है। किसी व्यक्ति द्वारा जीवन में किए गए अच्छे कर्मों की संख्या यह निर्धारित करती है कि उसे अगले जन्म में कौनसा जीवन मिलेगा। चूँकि इंसान के रूप में वापस लौटने की कोई गारंटी नहीं हैं, तो बेहतर है की इसी एक जीवन को कोई अर्थ दिया जाए। तो क्यूँ ना हम अपनी कहानी को ऐसा बनाए की लोग हमें याद रखे, क्या भरोसा कि इंसान का ये रूप हमें फिर कभी मिले ना मिले
अपनी कहानी छोड़ जा,
कुछ तो निशानी छोड़ जा,
कौन कहे इस ओर,
तू फिर आए ना आए
“यदि आप जीवित रहना चाहते हैं, तो एक विरासत छोड़ें। दुनिया पर एक ऐसी छाप छोड़ो जिसे मिटाया नहीं जा सकता।” -माया एंजेलो
यह गीत सच मायनों में आत्मा की पुकार है, सदैव के लिए रहने वाली आत्मा की यही एक चाह है उस शरीर से जिसमें कि वो रहती है।
शैलेन्द्र के शब्द कबीर की प्रतिध्वनि हैं, जिन्होंने कहा भी था, "कबीरा जब हम पैदा हुए, जग हँसे हम रोये, ऐसी करनी कर चलो, हम हँसे जग रोये"।
हमारे जीवन पानी के एक जहाज़ की तरह है जहां हमें शांत पानी और अराजक तूफ़ान, दोनों से निबटना पड़ता है। जो पल हमें अच्छे लगते हैं वो तो हमें ख़ुशी से भर देते हैं परंतु दुःख के पल हम में एक निराशा भर देते हैं।
पर निराशा चाहे जैसी भी हो, हमें अपने ऊपर संदेह करने की कोई ज़रूरत नहीं है। कोई भी निराशा जीवन की ख़ूबसूरती के आगे कुछ भी नहीं है। जब हम अपने चारों तरफ़ देखते हैं तो पाते हैं की प्रकृति ने हमारे चारों तरफ़ कितनी सुंदरता बिखेरी है। प्रकृति का एक-एक कण हमारे लिए ही है, चाहे वह सूरज की पहली किरण हो या शांत चांदनी, खुले हरे मैदान या हमारे सिर के ऊपर नीला आकाश, हरे-भरे जंगल या पहाड़, संगीतमय नदियाँ से या तट पर टकराती समुद्री लहरें, पक्षियों की मधुर चहचहाहट या घाटियों की शांति।
अपने हर रूप में प्रकृति की सुंदरता हमें खुश रहने का मंत्र ही बताती है।
शैलेन्द्र ने भी प्रकृति की सुंदरता पर प्रकाश डाला है। फूल और कलियाँ हमें देखकर मुस्कुराते हैं, कोयल हमारे लिए गाती है, विस्तृत विशाल नीला आकाश मुस्कुराहट बिखेरता है, और यहाँ तक कि हमारी साँस भी एक लयबद्ध और संगीतमय तरीके से ही चलती है। शैलेंद्र कहते हैं कि जब भगवान के ये सब उपहार हमारे आसपास रहते हैं तो हमें निराश होने की ज़रूरत नहीं है
तेरी राह में कलियों ने नैन बिछाए,
डाली-डाली कोयल काली तेरे गीत गाए,
नीला अंबर मुस्काए,
हर सांस तराने गाए,
हाय तेरा दिल क्यों मुरझाए
फिर भी कभी यदि निराशा के नीरस क्षण आते हैं तो उनका सामना साहसपूर्वक करना चाहिए। शांति प्राप्त करने के लिए अपने भीतर गहराई से उतरना बहुत ज़रूरी है क्यूँकि सच्ची ख़ुशी भीतर से ही आती है।
मन की बंसी पे तू भी,
कोई धुन बजा ले भाई,
तू भी मुस्कुरा ले
अब आता है इस गाने का सबसे अहम हिस्सा।
शैलेन्द्र हमें जीने की राह दिखाते हैं लेकिन चेतावनी भी देते हैं।
कोई भी व्यक्ति या कोई भी प्रयास समय की गति को नहीं बदल सकता। समय न तो रुकता है और न ही किसी का इंतजार करता है।
कई बार हम खुद ही चीजों को आगे के लिए टाल देते हैं और समय हमारे हाथ से निकल जाता है।
शैलेन्द्र इंसान के इस चरित्र को अच्छी तरह समझते हैं। वह हमें कड़े शब्दों में अच्छी तरह से चेतावनी देते हैं (मौसम बीता जाए), जिसका अर्थ है कि समय तेजी से खत्म हो रहा है।
'मौसम बीता जाए' हमारे लिए चेतावनी का काम करता है जिसे इस गाने में कई बार दोहराया गया है ताकि हमें याद रहे कि समय अपनी गति से चले जा रहा है। कुछ भी अच्छा करने का सही समय है तो 'अभी' है। ऐसे लगता है कि शैलेन्द्र नहीं चाहते कि हम समय के मूल्य को नज़रअंदाज़ करें।
इसलिए ये गीत सिर्फ़ एक गीत ही नहीं उससे बहुत अधिक है। यह गाना खुद को जानने और समझने का एक प्रयास है और जब आप इस गीत का अर्थ समझ जाते हैं, तो यह आत्मज्ञान के बारे में एक गीत बन जाता है।
"अपना जीवन अच्छे कार्य करते हुए और अपनी छाप छोड़ते हुए जीना ही अमरता है।" -ब्रैंडन ली

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